मुंबई :श्रमिकों का पलायन रूकना जरूरी - भवानजी

मुंबई। जिन मालिकों के लिए श्रमिकों ने अपना सर्वस्व छोड़कर उनको धन्नासेठ बनाने में अपने परिश्रम की पराकाष्टा का परिचय दिया। जो श्रमिक घर बार, परिवार छोड़कर सेठ को अपने धंधे में प्रगति के लिए सतत रात दिन काम में लगे रहे। दिन-रात को देखे बिना वह कार्य को अंजाम देकर सेठ को और अधिक धनवान पूंजीपती बनाते गए। आज जब विपदा की घड़ी आई तो इन मालिकों ने श्रमिकों से अपना मुंह ही मोड़ लिया और रामभरोसे छोड़ दिया। जिनसे उन्होंने कमाया, क्या उनको चंद दिनों तक रोटी की व्यवस्था भी यह मालिक नहीं कर सकते हैं ? उक्त बातें वरिष्ठ भाजपा नेता तथा मुंबई के पूर्व उपमहापौर बाबूभाई भवानजी ने कही हैं। उन्होंने कहा कि गत वर्ष गुजरात मे दीपावली के 2 माह पूर्व किसी मनचले नेता ने जब उत्तर प्रदेश, बिहार के प्रवासी भाईयो के लिए एल फेल (अपशब्द) बोल अपनी राजनीति चमकाने के लिए भय का वातावरण पैदा किया था, उस समय श्रमिक घबराकर पलायन करने लगे थे। दीपावली का सीजन  सामने देखकर इन्हीं धन्नासेठों ने व फैक्ट्री वालों, कंस्ट्रक्शन के व्यापारियों ने सरकार पर दवाब बनाया था कि यदि मजदूर श्रमिक चले जाएंगे तो हमारा क्या होगा ? हमारे सामने दीपावली है सब धंधा चौपट हो जाएगा, का रोना रो रहे थे। भवानजी ने कहा कि कारोबारियों ने अपने व्यापार हेतु सरकार पर दवाब बनाए। मुख्यमंत्री तक को मध्यस्थता कर उनको यहां पर रोकने के भरचक प्रयत्न हुए। सरकार ने श्रमिकों पर दवाब बनाया, वे सरकार तथा रोजगार दाताओं का सम्मान कर रूक भी गए, और उनके व्यापार में वृद्धि के लिए अपना पसीना बहाते गए। उन्होंने कहा कि जिन श्रमिकों ने अपने मालिकों, ठेकादारोंं, व्यापारियों यहां तक की वहां की राज्य सरकारों को बडा बनाने के लिए इतना कुछ किया, क्या कोरोना लाकडाऊन विपदा की इस घडी में इन श्रमिकों के साथ खडा रहने का कोई दायित्व नहीं है। लाखों की तादाामेंद

तादाद में विविध राज्यों में रोजी-रोजगार के लिए गए प्रवासी श्रमिक आज वैश्विक महामारी के चलते पिछले दो महीनों से जारी लाकडाऊन के कारण भुखमरी की कगार पर हैं, और भूखे-प्यासे पैदल ही सैकड़ों-हजारों किलोमीटर अपने गांव जाने को विवश हो चुके हैं। क्या उनके रोजगार-दाता संकट की इस घडी में इन श्रमिकों के राशन-पानी की व्यवस्था नहीं कर सकते हैं। आखिर व्यापारियों ने किस नैतिकता के आधार पर अपने कामगारों-मजदूरों को उन्हें, उनके ही हाल पर छोडकर कैसे मुंह मोड लिया है। बाबूभाई भवानजी ने कहा कि रोजगार दाताओं की इन्हीं बेरूखी के कारण ही इन मजदूरों को दर-दर भटकना पड़ रहा है। वे   अपने गांव की ओर जा रहे हैं। यदि इन्हें रोजी-रोटी  सुरक्षा और सम्मान मिलता, तो इनमें से कोई अपने गांव की ओर जाने के लिए विवश नहीं होता। उन्होंने कहा कि असली चुनौती तो लाकडाऊन खत्म होने के बाद शुरू होने वाली है, जब व्यापारियों को अपना व्यापार खडा करना होगा। ऐसे समय में उन्हें मजदूरों, कामगारों की सख्त जरूरत होगी, लेकिन यह लोग अपने गांव पहुंच चुके होंगे। व्यापारियों, फैक्ट्री-कारखाना मालिकों तथा सरकार से अपील करते हुए भवानजी ने कहा कि वे कोरोना महामारी के इस संकट के दौरान अपने श्रमिकों के स्वास्थ्य को संभाल कर रखने, उनके रहने, खानपान का समुचित प्रबंध करें। जिस प्रकार श्रमिकों ने आपके धंधे-कारोबार को आगे बढाने में अपना खून-पसीना बहाया, और भविष्य में भी आपके काम यही लोग आने वाले हैं, वैसे ही संकट की इस घडी में इन्हें संभालने का नैतिक जिम्मेदारी आपकी ही है। उन्होंने कहा कि हालांकि बडी तादाद में व्यापारी, फैक्ट्री-कंपनी मालिक ऐसे भी हैं, जिन्होंने कोरोना संकट में अपने कामगारों, मजदूरों का बेहतर ध्यान रखा है, और इनके श्रमिक वर्ग भी पूरी निष्ठा के साथ आज भी इनके साथ जुडे रह कोरोना लाकडाऊन खत्म होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, ताकि वे सभी अपनी पूरी ताकत लगाकर अपने कारोबार को दोबारा पटरी पर ला सकें। भवानजी ने कहा कि देश के सभी व्यापारी इनसे सबक लें, तो प्रवासी श्रमिकों के पलायन पर काफी हद तक रोक लग सकती है।