फडणवीस के मंत्री ने ही अजित पवार को दिलाई क्लीन चिट

मुंबई : महाराष्ट्र के सिंचाई घोटाले में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) नेता अजित पवार को ऐंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने क्लीन चिट दे दी है। अब हाई कोर्ट की नागपुर बेंच में दाखिल किए गए एक ऐफिडेविट में यह बात सामने आई है कि इस सबके पीछे देवेंद्र फडणवीस की सरकार का हाथ रहा है। ये ऐफिडेविट एसीबी ने 27 नवंबर 2019 को हाई कोर्ट में दाखिल किए थे। बता दें कि अजित पवार ने देवेंद्र फडणवीस की सरकार बनवाने के लिए समर्थन दिया था और खुद भी उपमुख्यमंत्री बने थे। ऐफिडेविट के मुताबिक, तत्कालीन जल संसाधन मंत्री गिरीश महाजन के नेतृत्व में एसीबी ने मामले में जांच शुरू की। 10 सितंबर 2018 और 11 जून 2019 के लेटर्स में यह बात सामने आई कि अगर टेंडर कॉस्ट लागत से 5 पर्सेंट ज्यादा रखी जाती है तो फैसला एग्जिक्युटिव डायरेक्टर द्वारा लिया जाता है। वहीं, अगर यह 5 पर्सेंट से 15 पर्सेंट के बीच में होती है तो प्रमुख सचिव की अध्यक्षता में बनी एग्जिक्युटिव कमिटी इसपर फैसला लेती है। अगर टेंडर कॉस्ट 15 पर्सेंट से भी ज्यादा होती है तो प्लानिंग और फाइनैंस विभाग के सचिवों की कमिटी इसपर फैसला लेती है। 

एसीबी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस मामले में विदर्भ सिंचाई विकास परिषद (वीआईडीसी) के चेयरमैन की कोई भूमिका नहीं है। ऐसे में उन्हें इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। बाद में यह भी स्पष्टीकरण दिया गया कि प्रशासनिक अनुमति देने और मोबिलाइजेशन अडवांस (अडवांस पेमेंट) की अनुमति देने में राज्य सरकार का कोई नुकसान नहीं हुआ है। यह भी आशंका जताई जा रही है कि जल संसाधन मंत्रालय द्वारा एसीबी को भेजे गए लेटर के आधार पर ही अजित पवार को क्लीन चिट दी गई है। बता दें कि इस कथित 70,000 करोड़ रुपये के सिंचाई घोटाले के समय अजित पवार ही जल संसाधन मंत्री थे और वीआईडीसी के चेयरमैन भी, जिसके चलते उनका नाम सामने आया था। जानकारी के मुताबिक, एसीबी की अमरावती और नागपुर ब्रांच ने बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच में ये ऐफिडेविट दाखिल किए हैं। ये दोनों क्लीन चिट देने के मामले में लगभग एक जैसी ही हैं। एक साल पहले ही एसीबी ने जो ऐफिडेविट दाखिल किया था, ये ऐफिडेविट उससे बिलकुल उलट हैं। उस समय ये ऐफिडेविट एसीबी निदेशक संजय बरवे द्वारा दाखिल किए गए थे। संजय बरवे ने 26 नवंबर 2018 को रिपोर्ट में कहा था कि एसीबी ने सिंचाई घोटाले में अजित पवार की भूमिका की बारीकी से जांच की है। हालांकि, 27 नवंबर 2019 को नागपुर के एसीबी सुपरिंटेंडेंट रश्मि नांदेड़कर और अमरावती एसीबी सुपरिंटेंडेंट श्रीकांत धिरवे के ऐफिडेविट में कहा गया है कि इस मामले में अजित पवार की कोई भूमिका नहीं है। एसीबी के निदेशक परमबीर सिंह ने कहा कि नागपुर और अमरावती एसीबी द्वारा फाइल किए गए ऐफिडेविट सबूतों और जल संसाधन मंत्रालय के पत्रों के आधार पर दिए गए हैं।

इस मामले में दायर की गई जनहित याचिका में मुख्यत: दो आरोप लगाए गए हैं। पहला: टेंडर कॉस्ट को लेकर दी गई अनुमति और उसी में रिवाइज्ड प्रशासनिक अनुमति। दूसरा: टेंडर बुकलिस्ट में जिक्र ना होने के बावजूद ठेकेदार को अडवांस पेमेंट दिए जाने की अनुमति। संजय बरवे ने अपने ऐफिडेविट में कहा था कि एसीबी ने कई सिंचाई प्रॉजेक्ट्स का अध्ययन किया, जोकि वीआईडीसी और कोंकण सिंचाई विकास परिषद के अंतर्गत थे। इन प्रॉजेक्ट में देरी, लागत में बढ़ोतरी और प्रॉजेक्ट के उद्देश्य को लेकर सवाल उठे। बरवे ने अपने ऐफिडेविट में कहा कि इन प्रॉजेक्ट्स में कई सारी अनियमितताएं सामने आईं। इस मामले में अजित पवार कहते हैं कि उन्होंने सचिव स्तर के अधिकारियों के सुझाव पर फैसले लिए। उन्होंने यह भी कहा कि ज्यादातर फैसले फील्ड लेवल पर लिए। संजय बरवे ने इस मामले में यह कहा था कि मंत्री यानी कि अजित पवार ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करते हुए अधिकारियों पर फैसले थोपे। पूर्व सीएम देवेंद्र फडणवीस ने इस मामले में कहा था, 'मुझे 100 पर्सेंट भरोसा है कि हाई कोर्ट नागपुर एसपी के ऐफिडेविट को खारिज कर देगा। नियमों के खिलाफ टेंडर के दाम बढ़ाए गए थे और मोबिलाइजेशन की अनुमति भी गैरकानूनी रूप से दी गई थी।