मुंबई : राजनीति को चौंका रहे दो चेहरे- अजित पवार और भगत सिंह कोश्यारी

मुंबई : महाराष्ट्र की राजनीति में इस वक्त दो नामों की चर्चा सबसे अधिक हैं। एक भगत सिंह कोश्यारी और दूसरे अजित पवार। भगत सिंह कोश्यारी के राज्यपाल बनने के बाद ही महाराष्ट्र में सरकार गठन का पेच कुछ ऐसा फंसा कि वह मीडिया की सुर्खियों में लगातार बने हुए हैं। उधर अजित पवार ने ऐसा दांव चला, जिसकी कल्पना राजनीति के बड़े-बड़े पंडित भी नहीं कर पाए। राजनीतिक विरासत को लेकर उनकी लंबे समय से अपने चाचा से नहीं पट रही है। लगभग तीन दशक पहले राजनीति में आने वाले अजित पवार ने पहली बार अपने चाचा शरद पवार की छत्रछाया से निकलकर अपने लिए अलग रास्ता चुना है। वैसे वह काफी समय से उधेड़बुन में थे। कहा तो यह भी जाता है कि उधेड़बुन से बाहर निकलना उनके लिए कोई नया घटनाक्रम नहीं है। कभी फिल्मों में जाते-जाते अजित पवार इसी तरह से राजनीति में आ गए थे। अजित पवार के पिता अनंतराव पटेल फिल्मों से जुड़े थे और मशहूर फिल्मकार वी. शांताराम के साथ काम करते थे। उनके करीबी बताते हैं कि शुरू में अजित पवार अपने पिता की तरह बॉलिवुड में किस्मत आजमाना चाहते थे। एक बड़ी फिल्म को लेकर बात हो गई थी, लेकिन बाद में अपने चाचा शरद पवार से प्रभावित होकर वह राजनीति में आ गए। अजित पवार ने अपनी सियासी एंट्री 28 साल की उम्र में सन 1991 में मारी थी और कांग्रेस के टिकट पर बारामती लोकसभा सीट से निर्वाचित हुए थे। बाद में जब शरद पवार को खुद एक सीट की जरूरत हुई तो अजित ने अपने चाचा के लिए यह सीट छोड़ दी। लोकसभा के बाद वे बारामती विधानसभा सीट से जीते और वहां से लगातार 6 बार चुने गए। इस बार भी उन्होंने वहीं से जीत हासिल की। 

अजित पवार को यकीन था कि शरद पवार के राजनीतिक वारिस वही होंगे। लेकिन जब सुप्रिया की राजनीति में एंट्री हुई तो उन्हें लगा कि चाचा की राजनीतिक विरासत उनके हाथ नहीं आने वाली। यहीं से राजनीतिक खटास का दौर शुरू हुआ। सितंबर 2012 में वह संकट में आए जब उन्हें सिंचाई घोटाला सामने आने के बाद त्यागपत्र देना पड़ा। बीजेपी ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया था। तब पूरे देश में एंटी करप्शन मूवमेंट भी चल रहा था, लेकिन शरद पवार ने अपने भतीजे का तब भी साथ दिया और दो महीने में ही इनकी दोबारा वापसी कराई। उसी समय उनका समर्थकों के साथ अभ्रदता करने वाला विडियो सामने आया। हर ओर से घिरे अजित पवार के लिए यह दौर संकट भरा रहा, लेकिन उन्होंने अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी। कहते हैं कि वह अपने सभी कार्यकर्ताओं का नाम जानते हैं। महाराष्ट्र में दादा नाम से मशहूर अजीत पवार की सत्ता के करीब रहने की महत्वाकांक्षा शुरू से रही है। 2009 में जब कांग्रेस-एनसीपी सरकार में डेप्युटी सीएम की जगह नहीं मिली तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से नाखुशी दिखाई थी।

77 साल के भगत सिंह कोश्यारी ने उत्तराखंड के एक बेहद छोटे और पिछड़े गांव से निकलकर सीएम बनने, सांसद बनने और फिर गवर्नर बनने तक का सफर तय किया है। कोश्यारी बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे। उन्होंने अल्मोड़ा कॉलेज से पढ़ाई की। 1961 में कोश्यारी अल्मोड़ा कॉलेज छात्रसंघ के महासचिव चुने गए। आपातकाल में वह करीब 19 महीने जेल में रहे। किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले कोश्यारी का परिवार बाद में उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में आ गया। पिथौरागढ़ में वह कई आंदोलनों में सक्रिय रहे और इस वजह से पुलिस थाने में काफी वक्त तक उनका नाम भी दर्ज रहा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा का प्रसार करते हुए कोश्यारी ने पिथौरागढ़ के शिशु मंदिर स्कूल में काफी वक्त तक पढ़ाया भी। आचार्य के काम के साथ वह छात्रों के परिवार वालों से संपर्क में रहते थे और उन्हें संघ के बारे में बताते थे। वहां अब भी लोग उन्हें आचार्य जी कहते हैं। कोश्यारी पत्रकार भी रहे। उन्होंने पिथौरागढ़ से पर्वत पीयूष नाम का साप्ताहिक पत्र निकाला, जिसके जरिए वह संघ की विचारधारा को सामने रखते थे। उत्तराखंड अलग राज्य बनने से पहले कोश्यारी को 1997 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद का सदस्य चुना गया। जब यूपी से अलग होकर उत्तराखंड राज्य बना तो नित्यानंद स्वामी सरकार में कोश्यारी मंत्री बने। लेकिन 2002 में उन्हें उत्तराखंड की कमान देकर मुख्यमंत्री बनाया गया। जब वह सीएम बने तो कई उच्च अधिकारियों के साथ अपने गांव पहुंचे। तब उनके गांव तक सड़क नहीं जाती थी और वहां पहुंचने के लिए करीब 7-8 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। जब कोश्यारी गांव गए तो सबसे तेज वही चल रहे थे। बाकी लोग और अधिकारी काफी पीछे छूट गए। उस वक्त अखबारों में इसकी काफी चर्चा हुई। बीजेपी ने उत्तराखंड में अगला चुनाव उनके नेतृत्व में ही लड़ा, पर हार गई। तब वह नेता प्रतिपक्ष बने और 2007 तक नेता प्रतिपक्ष रहे। कोश्यारी 2007 से 2009 तक उत्तराखंड में बीजेपी प्रमुख भी रहे और उनके अध्यक्ष रहते जब बीजेपी चुनाव जीती तो वह सीएम पद के दावेदार थे लेकिन तब बीजेपी ने उनकी दावेदारी को नजरअंदाज कर बीसी खंडूरी को सीएम बना दिया। कोश्यारी 2008 में राज्यसभा सदस्य बने और 2014 के लोकसभा चुनाव में नैनीताल सीट से जीते।