सरकार खोकर भी जीत देख रही भाजपा

महाराष्ट्र राष्ट्रपति शासन के कगार पर खड़ा है। भाजपा और शिवसेना में दोषारोपण शुरू हो चुका है, लेकिन इसके साथ ही दोनों दलों में यह आकलन भी शुरू हो गया है कि किसने खोया और किसने क्या पाया। यह सच है कि भाजपा के लिए यह एक राजनीतिक झटके जैसा है क्योंकि जो नतीजा आया था उसमें इसकी कल्पना भी नहीं थी कि सरकार अटक जाएगी। संख्या बल में लगभग आधा होने के बावजूद शिवसेना की ओर से की गई मुख्यमंत्री पद की जिद को नकारना भी एक उपलब्धि है। भविष्य में यह न केवल महाराष्ट्र, बल्कि दूसरे राज्यों में भी सहयोगी दलों के लिए संदेश है। भाजपा के अंदर कई नेता इसे जीत के रूप में भी देख रहे हैं। अगर महाराष्ट्र की बात की जाए तो भाजपा वहां दोनों फॉर्मूले आजमा चुकी है। 2014 में शिवसेना से अलग होकर लड़ चुकी है और सरकार बना चुकी है। 2019 में साथ लड़कर उलझ चुकी है। पिछले छह-सात वर्षो में शिवसेना के साथ जिस तरह के रिश्ते रहे हैं उसमें यह भी साफ हो गया है कि इस दोस्ती में विश्वसनीयता और सम्मान जीरो है। ऐसे में महाराष्ट्र में हिंदुत्व के नाम भी ये दोनों दल दिल से एक हो पाएंगे इसकी संभावना बहुत कम है। ध्यान रहे कि लंबे अरसे तक शिवसेना महाराष्ट्र में बड़े भाई की भूमिका में रही, जिसे 2014 और फिर 2019 में भाजपा ने ध्वस्त किया। मुख्यमंत्री पद हासिल कर शिवसेना फिर से बड़े भाई की भूमिका में आना चाहती थी जिसे भाजपा ने नकार दिया, लेकिन महाराष्ट्र से परे भी सहयोगी दलों के लिए संदेश है कि भाजपा अपनी हकमारी नहीं होने देगी। अभी कई राज्यों में राजग की सरकारें हैं। बिहार में तो खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने घोषित कर दिया है कि नीतीश कुमार ही चेहरा होंगे, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले दिनों केंद्र में भागीदारी को लेकर सहयोगी दलों की ओर से तेवर दिखाए जाते रहे हैं।