सहयोगी दलों के नेताओं को तोड़ रही बीजेपी

मुंबई : मुंबई के भुसावल में रविवार रात बीजेपी के एक पार्षद रवींद्र खरात और उनके परिवार के तीन सदस्यों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उनके अंतिम संस्कार में बीजेपी नेताओं से ज्यादा रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले समूह) के कार्यकर्ताओं की संख्या थी। यहां तक कि आरपीआई (ए) के अध्यक्ष रामदास अठावले भी अपने आधिकारिक कार्यक्रमों को स्थगित कर उन्हें श्रद्धांजलि देने भुसावल पहुंचे थे।

रवींद्र खरात भुसावल म्यूनिसिपल चुनाव में बीजेपी के टिकट पर पार्षद चुने जाने से पहले लंबे समय तक आरपीआई (ए) के सदस्य थे। बीजेपी और आरपीआई (ए) महाराष्ट्र में सहयोगी पार्टियां हैं और आरपीआई (ए) ने जब भुसावल सिविक पोल में सीट की मांग की तो बीजेपी ने इस सीट को सिर्फ एक शर्त पर आरपीआई को दिया था कि रवींद्र बीजेपी के चुनाव चिह्न पर लड़ेंगे। इस कदम से बीजेपी के लिए दो चीजें पक्की हुईं। पहली, पार्टी के चुनाव चिह्न पर लड़ने वाला उम्मीदवार अपने आप उनकी पार्टी में आ गया और दूसरा, इससे बीजेपी की ताकत बढ़ने का संदेश गया। पार्टी लंबे समय से सरकार में शामिल अपने ही सहयोगी दलों के सदस्यों को सुनियोजित ढंग से अपने पाले में लाती रही है।

उदाहरण के लिए सदाभाऊ खोट को स्वाभिमानी शेतकारी संगठन (एसएसएस) के प्रेसिडेंट राजू शेट्टी का विश्वासपात्र और उनका पुराना सहयोगी माना जाता था। वह देवेंद्र फडणवीस सरकार में एसएसएस कोटे से मंत्री भी बने थे। हालांकि 2017 में सदाभाऊ एसएसएस से इस्तीफा देकर बीजेपी में शामिल हो गए। शेट्टी के समर्थक दावा करते हैं कि बीजेपी के संपर्क में आने के बाद सदाभाऊ का पार्टी को लेकर रवैया बदल गया था और उन्हें पाला बदलने में ज्यादा समय नहीं लगा। इससे नाराज शेट्टी ने इसके तुरंत बाद केंद्र और राज्य की बीजेपी-शिवसेना सरकार से खुद को अलग कर लिया था।

महाराष्ट्र के मौजूदा विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने दौंड विधानसभा से राष्ट्रीय समाज पक्ष के मौजूदा विधायक राहुल कुल को टिकट दिया है। आधिकारिक रूप से बीजेपी का कहना है कि राहुल को आरएसपी के साथ हुए सीट बंटवारे के तहत टिकट मिला है। हालांकि आरएसपी चीफ महादेव जंकार ने इसे धोखा बताया है। उन्होंने दावा किया कि उनका कोई भी कार्यकर्ता बीजेपी के टिकट पर चुनाव नहीं लड़ेगा। जंकार ने कहा, 'ये मेरे उम्मीदवार नहीं है। जिस दिन से उन्होंने बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना शुरू किया, उस दिन से वे बीजेपी के हो गए।' बीजेपी ने आधिकारिक रूप से आरपीआई (ए) को चार सीटें देने का ऐलान किया है, लेकिन यहां भी ये चारों उम्मीदवार बीजेपी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ेंगे।